क्या गाय का दूध पीने से ही गाय की रक्षा होती है?

गाय का दूध अमृत होता है, इसको पीने से कोई रोग नहीं होता, यह माँ के दूध के सामान होता हैऔर न जाने क्या क्या बातें गाय और उसके दूध के बारे में की जाती है। यही सब बातें पीढ़ी दर पीढ़ी दूध पीने की आदत को आगे बढाती रहती है।

गाय का दूध क्या होता है?

क्या प्रकृति में किसी भी पशु के दूध का उद्देश्य इंसान के दूध से अलग होता है? एक इंसानी माँ जो सिर्फ अपने बच्चे को ही एक नियत समय के लिए दूध पिलाती है क्या उस बछड़े की माँ से अलग होती है जिस बछड़े की माँ का दूध हम पीने की चाहत रखते हैं?

यह तो हम सब मानते हैं कि किसी भी नवजात के लिए उसकी माँ का दूध ही एक सम्पूर्ण और जरुरी आहार होता है तो हम किसी पशु के बच्चे के लिए इस तथ्य को अनदेखा क्यों कर देते हैं?

क्या गाय का बछड़ा उसकी माँ का सारा दूध पी सकता है?

गाय और उसके दूध के सेवन करने के पक्ष में दी जाने वाली दलीलें

जब कोई काम प्रकृति के नियमों के विरुद्ध किया जाता है तो उसको सही ठहराने के लिए बहुत सी दलीलें दी जाने लगती है। यही बात इंसानों द्वारा पशुओं के दूध के प्रयोग पर भी लागू होती है।

दूध नही निकालेंगे तो गायें बूचड़खाने चली जाएगी।

मेरा यह निजी अनुभव है कि यह दूध पीने के बचाव में सबसे ज्यादा दी जाने वाली दलीलों में से एक है। इससे शायद दूध पीने वालों के मन में एक जीव दया की भावना पैदा होती है कि वह किसी पशु का दूध पी कर उस पशु को बचा रहे हैं और अगर वह गाय का दूध नहीं पीयेंगे तो माँसाहारी लोग सारी गायों को काट कर खा जायेंगे।

अगर इस बात का विश्लेषण किया जाय कि आज तक सिर्फ दूध पीने के कारण ही गायों की रक्षा हो रही है तो यह बहुत ही हास्यास्पद लगता है।

अगर ऐसा ही होता तो जो भी विलुप्त होते स्तनधारी जीव हैं उनको भी गुलाम बना कर उनका दूध निकल का पीना शुरू कर देना चाहिए।

यह बात तो सही है कि मनुष्य जब गायों का उपयोग दूध के लिए करता है तो उनकी संख्या निश्चित रूप से बढ़ने लगती है क्योकि कोई भी प्राणी तभी दूध पैदा करता है जब उसके बच्चा पैदा होता है। लेकिन जब दूध का उपयोग बढ़ने लगता है तब पशुओं की संख्या भी इतनी अधिक बढ़ने लगती है कि एक नयी समस्या खड़ी हो जाती है।

शायद ही भारत के अतिरिक्त यह दलील किसी और देश में दी जाती होगी। किसी भी अन्य देश में बेकार गायों और नर बछड़ों को मार कर उनसे गौमांस का उत्पादन किया जाता है। चूँकि हमारे देश में गायों को पवित्र माना जाता है और हमेशा उसके कत्ल का विरोध होता है इसलिए इस तरह के कुतर्क जन्म लेते हैं।

डेयरी और बूचड़खाने में क्या रिश्ता है?

हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम दूध तो भरपूर पीना चाहते हैं लेकिन उसके दुष्परिणाम स्वरुप जो पशुओं की सँख्या बढ़ती है और पशुओं को आजीवन पीड़ा सहन करनी पड़ती है उस बारे में बात नहीं करना चाहते हैं। यहाँ तक कि बढ़ती हुई गायों की संख्या को भी बहुत सी दलीलों के माध्यम से सही ठहराने की कोशिश करते हैं।

जब इस तरह दूध उत्पादन के परिणाम स्वरुप आवारा पशुओं की तादात बढ़ती है तो गौ-हत्या पर प्रतिबन्ध होने के बावजूद इनको कत्लखाने जाने से रोकना संभव नहीं होता। और जब इस तरह की घटनाएं सामने आती है तो यह कहा जाने लगता है कि देखिये लोग दूध के लिए गाय पालते हैं और उसको अपने पास रखते हैं नहीं तो सारी गायें ही कत्लखाने चली जायेगी।

अब यहाँ यह कोई नहीं समझना चाहता कि अगर हम दूध का उत्पादन ही नहीं करेंगे तो इतनी भारी मात्रा में गायें पैदा ही नहीं होगी और जब गायों की संख्या बढ़ेगी ही नहीं और सिर्फ प्रकृति द्वारा ही नियंत्रित होगी तो हमे इस तरह की दलीलें भी नहीं देनी पड़ेगी।

लेकिन हमारे देश में गौ दूध को भी इतना पवित्र मान लिया गया है कि अगर कोई दूध का यह कह कर विरोध करता है कि –

दूध इंसानों के लिए बिलकुल जरुरी नहीं है।

दूध की बढ़ती मांग के फलस्वरूप ही गायों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हो रही है।

यही बढ़ती हुई गायों की संख्या न केवल पर्यावरण को हानि पहुंचा रही है बल्कि हमारे जैसे अहिंसावादी लोगों का देश आज गौ-मांस के निर्यात में अग्रणी भी बना हुआ है।

तब भी कोई इस तथ्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं होता।

शायद हम एक ऐसी स्थिति में फंसे हुए हैं जहाँ हमें कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा और हम डेयरी उद्योग के कारण बढ़ती पशुओं की संख्या को भी विभिन्न हास्यास्पद दलीलों के माध्यम से सही ठहराने की असफल कोशिश करते रहते हैं।

कई बार नेताओं द्वारा भी ऐसी हास्यास्पद दलीलें दी जाती है जो उनके मानसिक दिवालियापन को हो दर्शाती है।

बढ़ती हुई गायों को कत्लखाने से बचने के लिए दी जाने वाली कुछ प्रमुख बेतुकी दलीलें इस प्रकार हैं।

गायों का दूध अमृत होता है। इसलिए ज्यादा से ज्यादा गायें होनी चाहिए और उनका दूध पीना चाहिए।

गायों के दूध में स्वर्ण का अंश होता है, इसलिए गौवंश बढ़ना चाहिए।

गायें ऑक्सीजन छोड़ती है। इसलिए जितनी ज्यादा गायें होगी उतना पर्यावरण के लिए फायदेमंद होगा।

एक बात यहाँ समझ से परे है कि हम इस धरती पर कितनी गायें चाहते हैं? क्या ज्यादा गायें होने से पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा नहीं जाएगा? लेकिन इन सवालों कोई संतोषप्रद उत्तर या हल कभी कोई नहीं दे पाया है।

एक बात जो बिलकुल स्पष्ट नज़र आती है और भारत के श्वेत क्रांति के जनक वर्गिश कुरियन ने भी कहा था कि अगर डेयरी उद्योग को फलना-फूलना है तो कत्लखानों पर प्रतिबन्ध नहीं लगाना चाहिए।

आज जिस रफ़्तार से देश में आवारा गायों की संख्या बढ़ रही है और चोरी छिपे गायों का कत्ल हो रहा है उसको देखते हुए हमें किसी एक चीज का चुनाव करना होगा। या तो हम सिर्फ दूध का भरपूर सेवन करें और गायों के कत्ल की चिंता न करें या फिर अगर हम गायों को सच में माता मानते हैं और उसकी पूजा करते हैं तो उनका दूध पीना बिलकुल बंद कर दें ताकि गायों की संख्या नहीं बढे और उन्हें कत्लखाने जाने से बचाना भी न पड़े।

गाय का दूध और गौमांस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं इन्हे अलग-अलग कर के देखना अपने आप को धोखा देने सामान ही होगा। ऊपर से यह तर्क देना कि दूध पीने से ही गौ रक्षा होती है मानसिक दिवालियेपन की ही निशानी लगती है।

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