क्या डेयरी, क्रूरता से मुक्त हो सकती है?

भारत में जहाँ गायों को पूज्यनीय और माता माना जाता है वहां डेयरी क्रूरता के बारे में कोई बात करना तो दूर इस बारे में कुछ सुनना भी नहीं चाहता है।

गायों को पालना एक पुण्य का कार्य समझा जाता है बिना इस बात की परवाह किये बिना कि वास्तव में किसी पशु को पालने का क्या मतलब होता है ? गायों के सन्दर्भ में तो शायद यही समझा जाता है कि उन्हें पालने का सिर्फ एक ही अर्थ है उनका दूध निकाला जाए। दूध निकालने के लिए गायों के साथ जो भी व्यवहार किया जाता है वह किसी भी दृष्टि से डेयरी वाले और दूध खरीदने वाले की नज़र में सिर्फ एक सामान्य प्रक्रिया माना जाता है।

आज डेयरी में होने वाली क्रूरताओं पर प्रश्न उठने पर मानवीय दूध की बात होने लगी है , लेकिन सवाल ज्यों का त्यों है कि क्या किसी पशु के अधिकारों की रक्षा करते हुए उससे कुछ लेना संभव है?

डेयरी क्रूरता का क्या पैमाना है?

अगर सही मायनों में देखा जाए तो हमने डेयरी क्रूरता के पैमाने अपनी सुविधानुसार तय किये हुए हैं। जबकि अगर उन्हीं पैमानों को किसी पशु के दृष्टिकोण से देखा जाए तो वह निश्चित ही क्रूरता प्रतीत होंगे।

किसी के साथ किया गया कोई भी व्यवहार किस सीमा तक सामान्य माना जायेगा और कब असामान्य माना जाएगा यह सब पैमाने हमने अपनी सुविधानुसार बनाये हुए हैं। विशेषकर जानवरों के सन्दर्भ में यह पैमाने हर जानवर के लिए भिन्न-भिन्न हैं। किसी जानवर को बंदी बना कर रखना सामान्य व्यवहार की श्रेणी में आता है तो किसी जानवर को मार कर खा जाना भी सामान्य है तो । लेकिन बहुत से जानवर ऐसे हैं जिनको नुकसान पहुंचाने पर कानूनी रूप से सजा का भी प्रावधान है।

किसी डेयरी में गाय के साथ कैसा व्यवहार होता है?

डेयरी में या घर पर गाय रखने वाले गायों के साथ क्या व्यवहार करते हैं उसे यहाँ बिना किसी पूर्वाग्रह के समझने की कोशिश करते हैं।

गायों को बांध कर रखना

किसी भी प्राणी को जिसका इस धरती पर अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व होता है रस्सियों से बाँध कर रखना कहाँ तक उचित है? और क्यों बाँध कर रखा जाता है ? अगर इसके पीछे इंसान का कोई स्वार्थ न हो तो शायद ऐसा कभी न हो लेकिन गायों से उनका दूध छीनना संभव नहीं है अगर उन्हें गुलाम बना कर न रखा जाए।

क्या अपने स्वार्थ के लिए किसी प्राणी को गुलाम बना कर रखना क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता? इसके बचाव में कई तर्क दिए जाते हैं लेकिन वह सब पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं।

गायों को जबरन गर्भवती करना

कोई भी प्राणी अपनी वंश वृद्धि के लिए प्रजनन करता है। यह एक बहुत ही प्राकृतिक प्रक्रिया है। लेकिन, डेयरी उद्योग में इस प्रक्रिया को कृत्रिम बनाया गया है। एक और प्राकृतिक रूप से होने वाली यह क्रिया किसी भी प्राणी के लिए सुखद अनुभव होता है वहीं कृत्रिम रूप से की गयी यह क्रिया बहुत ही दर्दनाक होती है।

क्या यह सामान्य प्रक्रिया कही जा सकती है?

गायों से निरंतर दूध मिलता रहे इस हेतु उसके दूध देने के काल में ही उन्हें पुन: गर्भवती कर दिया जाता है। ऐसी स्थिति कितनी पीड़ादायक होती होगी जब एक बच्चा माँ के समक्ष भूखा है और दूसरा उसके गर्भ में आ गया है।

जो प्रक्रिया प्राकृतिक रूप से किसी प्राणी के लिए वंश वृद्धि के लिए होती है उसे इंसान ने अपने लिए दूध पैदा करने का साधन बना लिया है। दूध पैदा करने के लिए की गयी गायों की वंश वृद्धि आज आवारा गायों और गौमांस जैसी भयंकर समस्या बन कर खड़ी हो गयी है।

क्या अप्राकृतिक रूप से बिना नर के किये गये दर्दनाक गर्भाधान को डेयरी क्रूरता नहीं माना जाएगा?

घर पर गाय पालन करना और उसका दूध निकलना कितना सही है?

गायों को मातृत्व सुख से वंचित रखना

गायों को दूध के लालच में बलात गर्भवती कर बछड़े पैदा करवाने के बाद होने वाले बछड़ों को अपनी माँ से अलग रखा जाता है और रस्सियों से भी बांधा जाता है। अगर नर बछड़ा है तो माँ का वात्सल्य तो शयद ही उसके नसीब में होता है।

बछड़ों को अपनी माँ से दूर बाँधा जाता है।

नर बछड़े से जल्दी से जल्दी छुटकारा पाने के लिए या तो उसे सड़कों पर आवारा घूमने के लिए छोड़ दिया जाता है या कत्लखाने की राह दिखा दी जाती है। अधिकतर नर बछड़े तो माँ के सामने ही भूख से तड़फ-तड़फ कर दम तोड़ देते हैं। अगर मादा बछिया है तो वह सिर्फ जिन्दा रहे उतना ही उसे अपनी माँ के दूध पीने की इजाजत होती है।

गाय का दूध निकलने के लिए बछड़े को गाय के पास बांध दिया जाता है और धोखे से गाय का दूध निकाल लिया जाता है जबकि बछड़ा भूखा ही रहता है। इसके बचाव में यह कुतर्क दिया जाता है कि अगर बछड़ा अपनी माँ का सारा दूध पी लेगा तो वह मर भी सकता है।

क्या इस तरह बछड़े को भूखा रख गाय का सारा दूध निचोड़ लेना डेयरी में होने वाली क्रूरता नहीं है?

ज्यादा दूध के लालच में उन पर अत्याचार करना

मारना पीटना और ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन लगाना

गाय अगर अपने मालिक के अनुसार व्यवहार नहीं करती तो उसे डंडे से मारना एक बहुत ही आम बात है। साथ ही ज्यादा दूध के लालच में गायों को हॉर्मोन के इंजेक्शन देना एक प्रथा सी बन गयी है। इस बात को जानते समझते हुए भी सभी लोग इस पर आँखें मूंद लेते हैं।

जब अप्रशिक्षित डेयरी किसान इस इंजेक्शन को ज्यादा दूध पाने के लालच में जानवरों पर प्रयोग करते हैं तो यह गायों के लिए बहुत दर्दनाक होता है।

ऐसी नस्ले तैयार करना जो ज्यादा दूध दे

इस तरह की अप्राकृतिक नस्लें सिर्फ ज्यादा दूध देने के लिए विकसित की जाती है। ज्यादा दूध पैदा करने के लिए उन्हें क्या-क्या पीड़ाएँ झेलनी पड़ती है इससे किसी को कोई मतलब नहीं होता। ऐसी गायों के थन एक प्राकृतिक गाय के थन से बहुत बड़े होते हैं जो उनके लिए असहाय पीड़ा का कारण बनते हैं।

क्या किसी प्राणी के साथ दूध पैदा करने की मशीन की तरह व्यवहार करना क्रूरता नहीं है?

बेकार हुई गायों से छुटकारा पाने की मजबूरी

डेयरी एक व्यावसायिक उपक्रम होता है जिसका एक मात्र उद्देश्य दूध बेच कर मुनाफा कमाना होता है। किसी भी व्यापार में उस काम से हमेशा बचा जाता है जो उनके फायदे में कमी करे या व्यापार में नुकसान करे। डेयरी में किसी भी गाय से एक समय तक ही फायदेमंद दूध की मात्रा ली जा सकती है और उम्र के साथ उसकी दूध उत्पादक क्षमता कम होने लगती है , ऐसी स्थिति में समय से पहले ही बूढी हुई गायों से छुटकारा पाना डेयरी वालों की मज़बूरी होती है।

अपनी इस मजबूरी के तहत कोई भी डेयरी वाला किसी न किसी युक्ति से इन बेकार हुई गायों से छुटकारा पाना चाहता है। जहाँ गौ हत्या पर प्रतिबन्ध है वहां इन्हे सड़कों पर आवारा जीने के लिए छोड़ दिया जाता है और जहाँ इनकी हत्या पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है वहां इन्हे कत्लखाने को बेच दिया जाता है।

यह हमारी कथित गौमाता का दुर्भाग्य ही है कि वह गुलामी में पैदा होती है और सड़कों पर या कत्लखाने में बेमौत मारी जाती है।

क्या इस तरह दूध के लालच में पैदा हुई गायें और नाकारा होने पर उन्हें बेमौत मरने देना डेयरी क्रूरता की श्रेणी में नहीं माना जायेगा?

एक मिनट का यह वीडियो सब कुछ बता देता है।

अब आप क्या सोचते हैं?

किसी भी डेयरी अथवा घर पर बाँध कर पाले जाने वाली गाय का हर पल गुलामी और अत्याचार में ही व्यतीत होता है लेकिन यह सब इतना सामान्य मान लिया गया है कि अब इसे आम व्यक्ति क्रूरता की दृष्टि से नहीं देखता बल्कि गायों के कल्याण से जोड़ता है। अगर उपरोक्त तर्क किसी भी कथित गौ-सेवक या गौ-प्रेमी के समक्ष रखें जाए तो इन्हे वह सिरे से खारिज कर इसे गौ-वंश के कल्याण से जोड़ देगा, अथवा धर्म का हवाला दे कर सही ठहराने की कोशिश करेगा।

आप क्या सोचते हैं? क्या इन क्रूरताओं के बिना किसी गाय से दूध प्राप्त किया जा सकता है?

दूध के लिए डेयरी में होने होने वाली क्रूरताओं को जानने और महसूस करने के लिए किसी भी पूर्वाग्रह के बिना चिंतन करने की आवश्यकता है।

18 Images Big Dairy Doesn’t Want You to See (but PETA Will Show You)

2 thoughts on “क्या डेयरी, क्रूरता से मुक्त हो सकती है?

  1. Oh, my heart is sinking read all this cruel truth. I can’t think all about this and all past image of our buffalo and calf is moving in front of my eyes, jinhe humne dudh ke liye pala tha. Ohh, anjane me itne bade pap kar rahe h hum
    Indirectly pashu-hatya.

    Really hum sab ko jagruk hone ki jarurat h, jyada se jyada ye jankari logo tak falane ki aavasyakta h.

    1. जी हाँ जागरूकता फ़ैलाने की सख्त जरूरत है और जल्द से जल्द दूध उत्पादों का प्रयोग भी बंद करने की जरूरत है।

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