क्या “गाय माता” के मिथक को तोड़ेगा गधी का दूध?

“गाय माता” की महिमा हमारे देश में किसी जूनून से कम नहीं है। पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे देश में यही सिखाया जाता रहा है कि गाय हमें दूध देती है इसलिए गाय हमारी माता है।

हमारे धार्मिक ग्रंथों में न केवल गाय के दूध का महिमा मंडन किया गया है अपितु आयुर्वेद में इसके स्वस्थ्य पर होने वाले प्रभावों के वर्णन के कारण यह हमारी संस्कृति और आहार का एक अटूट हिस्सा भी बन गया है।

यहाँ सवाल यह है कि क्या अगर गाय के दूध से भी ज्यादा पौष्टिक किसी अन्य जानवर का दूध पाया जाये तो क्या गाय से माता का दर्जा छीन जायेगा?

“गाय माता” के बाद अब गधी के दूध की महिमा !

हाल ही के वर्षों में गधी के दूध के बारे में बहुत सी ख़बरें पढ़ने और सुनने को मिली है। बहुत से शोध और इतिहास का हवाला देते हुए कहा गया है कि गधी का दूध न केवल इंसानों के लिए अमृत समान है बल्कि सौन्दर्य बढ़ाने के लिए इससे अच्छा कोई उपाय नहीं है।

गधी के दूध से सम्बंधित समाचार जब आम जन तक पहुँचने लगे तो इससे मुनाफा कमाने के लिए कई प्रकार के व्यापार भी खड़े होने लगे।

आलम यह है कि वह प्राणी (गधा) जिसे मूर्खता का पर्याय माना जाता है और जो सर्वाधिक शोषित जानवरों में से एक है, उसका दूध वयस्कों के लिए बहुत गुणकारी और बच्चों के लिए माँ के दूध के सामान पौष्टिक बता कर ऊँची कीमतों पर बेचा जा रहा है।

यही नहीं इसके दूध को उत्तम सौन्दर्य प्रसाधक बता कर उसके कई उत्पाद भी बाज़ार में आ गए हैं।

Delhi entrepreneur to bring donkey milk business to Karnatak 

हमारे यहाँ एक कहावत है “गधे को बाप बनाना” जिसमें गधे के प्रति तिरस्कार की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यहाँ मजेदार बात यह है कि जिस पशु को मूर्खता का पर्याय माना जाता रहा है उसी का दूध सबसे अधिक पौष्टिक बता कर ऊँची कीमतों पर बेचा जा रहा है लेकिन कोई भी यह सोचने और बात करने को तैयार नहीं है कि जिसका दूध इतना पौष्टिक है वह प्राणी अभी तक मूर्खता का पर्याय क्यों माना जाता रहा है?

गधी के दूध के पक्ष में दिए जाने वाले कुछ कुतर्क

गधों की कम होती संख्या को बढ़ाने में सहायक

दिल्ली की एक उद्यमी ने अपने स्टार्टअप के बारे में बताते हुए कहा कि पिछले 6-7 वर्षों में गधों की संख्या में तेजी से गिरावट आयी है और उनकी संख्या सिर्फ 1 लाख के आसपास ही रह गयी है क्योकि गधों का प्रयोग पहले की तुलना में बहुत कम हो गया है।

उनके अनुसार उनका गधी के दूध से बने उत्पादों का स्टार्टअप गधों की संख्या बढ़ाने में सहायक होगा। निःसंदेह अगर दूध की मांग बढ़ती है तो उत्पादन भी बढ़ेगा और इसके लिए कृत्रिम तरीकों से गधों के बच्चे पैदा कर दूध का उत्पादन किया जाएगा। बिलकुल वैसा ही जैसा अभी गाय और भैंस के दूध के लिए किया जाता है।

लेकिन यहाँ कुछ सवाल बिलकुल अनुत्तरित है कि –

  • गधी से दूध का दोहन करने के नाम पर अप्राकृतिक रूप से उनकी संख्या बढ़ाने से क्या हासिल होगा?
  • एक हद से ज्यादा संख्या बढ़ने पर क्या उनका वही हश्र नहीं होगा जो आज डेयरी की बेकार हुई गाय और भैंसो का होता है?
  • क्या अप्राकृतिक रूप से बढ़ी हुई गधों की संख्या पर्यावरण में असंतुलन पैदा नहीं करेगी?
  • क्या अनियंत्रित रूप से संख्या बढ़ने पर उनका कत्ल कर मांस उन देशों में निर्यात नहीं किया जाएगा जहाँ इसे खाया जाता है?

क्या गाय का दूध पीने से ही गाय की रक्षा होती है?

सौन्दर्य प्रसाधन का अचूक नुस्खा!

गधी के दूध को इस तरह प्रचारित किया जा रहा है मानों इसके बिना सुंदरता का कोई अस्तित्व ही नहीं है। एक सौन्दर्य प्रसाधन बनाने वाले स्टार्टअप के अनुसार –

यह एक प्राकृतिक मॉइस्चराइजर है , त्वचा को चमक देता है, रंग को निखारता है , उज्ज्वल और सुंदर त्वचा देता है, बढ़ती उम्र के परिणाम को कम करता है , प्राकृतिक त्वचा मृदुकारी, कोमल, स्वस्थ और चमकदार त्वचा प्रदान करता है।

ठीक है चलो मान लिया! चूँकि दूध भी एक रासायनिक पदार्थ है और हो सकता है इंसानों का सौन्दर्य बढ़ाने में सहायक भी हो लेकिन क्या यह इतना जरुरी है ? क्या इसके अतिरिक्त हमारा सौन्दर्य नहीं बढ़ेगा? क्या इससे बने उत्पादों को प्रयोग करने वाला इस बात से भली भाँती परिचित है कि जिस गधी के दूध से यह उत्पाद बना है वह दूध प्रकृति ने वास्तव में उसके नवजात बच्चे के लिए बनाया है और उसका हक़ मार कर यह उत्पाद बनाया गया है।

अगर गधी के दूध की मांग बढ़ी तो उसकी भी डेयरी खुलने लगेगी, जहाँ मुनाफा ही मुख्य उद्देश्य होता है न कि किसी पशु का कल्याण।

क्या डेयरी, क्रूरता से मुक्त हो सकती है?

गधी के दूध में हैं ‘अमृत’ के गुण!

इस तरह की हेडलाइन एक राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्र में छपी है और इस दूध का ऐसा महिमा मंडन किया गया मानों एक ऐसा अचूक नुस्खा मिल गया है जो इंसानो को अमर बना देगा। चाहे इसके लिए गधों को, दूध पैदा करने के लिए, इंसानों के शोषण का शिकार ही क्यों न होना पड़े। समाचार पत्र के अनुसार –

इसकी पोष्टिकता मां के दूध के समान होती हैं। ऐसा सिर्फ लोगों का ही नहीं बल्कि विशेषज्ञों का भी मानना है कि एक नवजात बच्चे के लिए मां का दूध जितना फायदेमंद होता है उतना फायदेमंद गधी का दूध होता हैं। ऐसे कई बच्चे है जो किसी समस्या के चलते अपनी मां का दूध नहीं पी पाते है उन्हें गधी का दूध (Donkey milk) पिलाया जा सकता है।

गधी के दूध में लाइसोजाइम जैसे पोषक तत्व पाए जाते है। जो नवजात शिशुओं में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते है। इससे बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है ताकि वह बीमारियों का सामना कर सकें। यह सर्दी, खांसी एव अस्थम से भी राहत दिलाता है।

ठीक है, दूध है पौष्टिक तो प्रकृति ने बनाया ही होगा लेकिन, दुनिया में अगर किसी भी प्रजाति की मादा का दूध मनुष्य के दूध के समकक्ष पाया जाता है तो क्या उस पर मनुष्य का अधिकार हो जाता है? क्या वह प्रजाति अतिरिक्त दूध का निर्माण करने लगती है जो उसके बच्चों का पेट भरने के साथ-साथ इंसानो के लालच को भी पूरा कर सके?

जिस पशु के साथ हम सदियों से दुर्व्यवहार करते आएं है अब उसी का दूध पीने की चाह रखते हैं!

यहाँ एक बात और भी बहुत महत्वपूर्ण है कि गधी के दूध को माँ के दूध के समान माना गया है जो अभी तक सिर्फ गाय के दूध को ही माना जाता रहा है और इसी कारण गाय को “गाय माता ” तक कहा जाता हैं।

अब मन में एक उत्सुकता जागी है कि जिस पशु को अभी तक निकृष्ट समझ कर उसका इंसानों द्वारा भरपूर शोषण किया जाता रहा है, क्या इंसानो द्वारा उसे भी वही दर्जा मिलेगा जो कि गाय को उसके दूध के कथित गुणों के कारण मिला हुआ है? जिस तरह से इसके गुणों के बारे में बताया गया है वह गाय के दूध से कहीं ज्यादा प्रतीत होते हैं तो फिर गधी को “गधी माता” कहने में कोई परेशानी भी नहीं होनी चाहिए।

अगर ऐसा नहीं होता है तो गाय को “गाय माता” कहना सिर्फ एक मिथक से ज्यादा कुछ नहीं है या फिर सिर्फ इंसान का स्वार्थ है और लोगों से गधी के दूध के नाम पर मोटी रकम ऐंठने का जरिया मात्र है।

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