क्या अब समय आ गया है डेयरी को ना कहने का?

जब आँख खुले तभी सवेरा! 

जी हाँ कभी-कभी कोई नींद की दवाई ले कर सो जाता हैं तो आसानी से आँखें नहीं खुलती और उठना बहुत ही तकलीफ़देह होता है। सच्चाई यही है कि चाहे कितनी भी गहरी नींद हो, नींद को भगा कर उठना ही होता है। जब उठते हैं तभी सवेरा मान कर आगे बढ़ जाना यही समझदारी कही जा सकती है।

आज यही बात दूध के उत्पादन और उद्योग पर भी पूरी तरह से लागू होती है। पशु-दूध को भिन्न-भिन्न कारणों (धार्मिक, व्यापारिक हित और स्वास्थय) से बहुत ज्यादा महिमा मंडित किया गया है और यह काम कई वर्षों से निरंतर किया जा रहा है। इसलिये आने वाली पीढ़ी इसी भ्रम में ही पैदा होती और बड़ी होती है कि दूध अमृत है, अच्छे स्वास्थ्य के लिए बेहद जरुरी है, एक सम्पूर्ण आहार है, दूध से बानी चीज़ों का खूब सेवन किया जाना चाहिए आदि-आदि।

अब जब इस तरह की घुट्टी किसी को जन्म से ही पिलानी शुरू कर दी जाती है तो यह इतने गहरे तक दिल और दिमाग में बैठ जाती है कि इसके नशे से बाहर आना बहुत मुश्किल हो जाता है लेकिन असंभव नहीं होता।

आज दूध को इतना प्रचारित करने  के पीछे मुख्यत: व्यवसायिक कारण है। डेयरी उद्योग और सरकार की मिली भगत, धार्मिकता और स्वास्थ्य का हवाला, इन सभी ने मिल कर ऐसा षड्यंत्र रचा है, या कहें कि यह एक ऐसा चक्रव्यहू बन चुका है जिससे बाहर निकलने के लिए पूर्वाग्रह रहित सोच की आवश्यकता है। 

क्या सच वही होता है जिसे बार बार हर तरफ से बोला जाये या वह होता है जो आपको अंदर से महसूस होता है? यही हो रहा है डेयरी उत्पादों के साथ, हर तरफ से डेयरी उत्पादों की पुरजोर वकालत की जा रही है और उपभोक्ता को सोचने  तक का भी मौका नहीं मिलता कि वह जो रोज खा-पी रहा है वह कितना अनैतिक है और कितना स्वास्थय को नुकसान पहुंचा रहा है।

बस हम जी भर कर खाये जा रहे हैं और हर तरफ से यही सुनाई देता है कि खपत और उत्पादन और बढ़ना चाहिए। इन सबके बीच अगर कोई यह सोच ले कर आता है कि डेयरी के बारे में जो भी महिमा मंडन हो रहा है वह एक चाल है, एक धोखा है, एक घोटाला है तो कोई विश्वास करने की बात तो दूर कोई सुनना भी नहीं चाहता।

यदि डेयरी की क्रूर सच्चाइयों को उजागर करने की कोशिश की जाए तो व्यक्ति नाराज़ भी हो जाता है कि दूध जैसी पवित्र चीज़ के बारे में ऐसा कैसे कह सकते हैं?

इतनी भ्रांतियों के बीच एक सकून देने वाली बात यह है कि आज की नौजवान पीढ़ी समझने लगी है और पुरानी  पीढ़ी के मुकाबले ज्यादा संवेदनशील है। इसके पीछे शायद इंटरनेट के माध्यम से आयी सूचना क्रान्ति का महत्वपूर्ण योगदान है।

नौजवान पीढ़ी हर बात को सिर्फ किसी के कहने मात्र से नहीं मानती वह खुद अपना विचार बनाती है और उस बारे में जानकारी जुटाती है। अगर उसे लगता है कि परम्परागत रूप से होने वाली कोई चीज़ गलत है तो उस विचारधारा को चुनौती देने से भी नहीं हिचकिचाती और बिना किसी पूर्वाग्रह के अपनी सोच पर चलती है। 

अगर किसी  उम्रदराज व्यक्ति के सामने डेयरी की क्रूरताओं के बारे में बात की जाए तो वह इसे स्वीकार करने में हिचकिचाता है लेकिन एक नौजवान इसे एक नए विचार की तरह लेता है और इस बारे में और जानकारी जुटाने की कोशिश करता है।

अब जब डेयरी का उत्पादन और खपत किसी भी समय के मुकाबले कहीं ज्यादा है और तेजी से बढ़ रहा है तो इसके दुष्प्रभाव भी तेजी से सामने आने लगे हैं। इसमें पशुओं की खेती (या पशुपालन) से पर्यावरण को होने वाले नुकसान और डेयरी के उपयोग से होने वाली बीमारियाँ, जिनकी कई वैज्ञानिक शोध से पुष्टि भी हो चुकी है, मुख्य हैं। पशु-दूध का अनैतिक पक्ष भी एक महत्वपूर्ण पहलू है जिसे अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाना जरुरी है। 

जितनी हानि इससे अब तक हो चुकी है उसको देखते हुए अब यह जरुरी हो गया है कि पशु-दूध का नशा अब उतरना चाहिए और हैंगओवर के बाद एक नयी सुबह का स्वागत करना चाहिए। 

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