अमूल का सफ़ेद झूठऔर पशु-दूध का काला सच!

हाल ही में अमूल के MD श्री आर एस सोढ़ी साहब ने एक के बाद एक Tweet/Retweet कर यह सन्देश देने की कोशिश की कि दूध सिर्फ उसी को माना जाए जो पशुओं से निकाला जाता है। अन्य सभी दूध जो विभिन्न वनस्पतियों जैसे सोया, बादाम, काजू, चावल, ओट्स, नारियल आदि से बनाये जाते हैं उन्हें दूध न कहा जाए, सिर्फ पेय पदार्थ कहा जाए। उन्होंने इसके पक्ष में कई दलीलें भी रखी।

हम यहाँ उनके हर Tweet/Retweet में छिपे हुए झूठ को उजागर करते हुए पशु-दूध के काले सच से आपको अवगत करने की कोशिश करेंगे।

क्या पशु-दूध अमृत है?

इस ट्वीट में उन्होंने एक अन्य ट्वीट को रीट्वीट करते हुए वनस्पति-जन्य दूध की और इंगित करते हुए लिखा है कि जानवरों के दूध के मुकाबले में इस प्रकार के वीगन दूध में पोषक तत्वों की कमी होती है, स्वाद की कमी होती है, यह लाखों गरीब किसानों को रोज़गार नहीं देते, कानूनन रूप से यह दूध नहीं कहे जा सकते, और जानवरों के दूध को नीचा दिखाते हुए ऊँची कीमत पर बेच लोगो को मूर्ख बनाते हैं।

इस ट्वीट में उन्होंने मुख्य रूप से पशु-दूध को पोषक तत्वों से भरपूर बताया और साथ ही इसे रोज़गार से भी जोड़ा है। उनके अनुसार:

क्या वनस्पति-जन्य दूध में कोई पोषण नहीं होता जबकि जानवरों का दूध मनुष्यों के लिए अमृत समान होता है?

मिस्टर सोढ़ी का यह बयान उतना ही सफ़ेद झूठ है जितना कि पशु-दूध ! पशु-दूध के इंसानों पर प्रभाव को लेकर कई अध्ययनों से यह सामने आया है कि पशु-दूध में कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो इंसानों में होने वाली कई घातक बिमारियों जैसे कैंसर, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, ऑस्टियोपोरोसिस, दूध से होने वाली एलर्जी इत्यादि का एक प्रमुख कारण है। पशु-दूध में कैल्शियम पाया जाता है लेकिन वह इंसानों के लिए इतना उपयोगी नहीं होता जितना कि किसी वनस्पति से प्राप्त कैल्शियम होता है। साथ ही इसमें केलोस्ट्रोल भी पाया जाता है जो किसी भी वनस्पति-जन्य दूध में नहीं पाया जाता है।

Health Concerns About Dairy

क्या पशु-दूध रोज़गार के अवसर पैदा करता है

ठीक है यह एक व्यवसाय है तो रोज़गार तो देगा ही ! साथ ही यह कत्लखानों में भी हज़ारों लोगों को रोज़गार देता है। दूध और कत्लखाने का रिश्ता सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया जाए और पशु-दूध से मिलने वाले रोज़गार में कत्लखानों से मिलने वाले रोज़गार के आंकड़े भी शामिल किया जाने चाहिए और फिर पशु-दूध का सेवन करने वालों पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि क्या यह उन्हें स्वीकार्य है? सिर्फ रोज़गार की दलील दे कर डेयरी उद्योग का समर्थन नहीं किया जा सकता जो हमारी सेहत के साथ-साथ पर्यावरण का भी नाश कर रहा है।

रोज़गार की ही बात करें तो अन्य कृषि उत्पाद भी बड़ी संख्या में रोज़गार उपलब्ध कराते हैं और अगर वीगन दूध की खपत बढ़ती है तो इनके कारण मिलने वाला रोज़गार भी कई गुना तक बढ़ सकता है।

क्या वनस्पति-जन्य वीगन दूध बहुत महंगा होता है

अगर थोड़े प्रयासों से इसे घर पर ही बनाया जाए तो इसकी लागत डेयरी दूध के बराबर या उससे भी कम ही होती है। अभी इसका बाज़ार इतना परिपक़्व नहीं हुआ है इसलिए बाज़ार में मिलने वाला वीगन दूध महंगा मिलता है लेकिन इसकी मांग बढ़ने पर स्वत: ही इसकी कीमतें कम हो जायेगी।

क्या अमूल दूध क्रूरता मुक्त है?

यहाँ एक ट्वीट को जिसमें दावा किया गया है कि वीगन दूध 100% आयातित सामग्री से ही बनाया जाता है, भारत में डेयरी उद्योग पूर्णत: क्रूरता मुक्त है और अपील की है कि लोकल डेयरी के बजाय सिर्फ जीवाणु मुक्त पैक किया हुआ दूध ही खरीदना चाहिए !

क्या वीगन दूध 100% आयातित सामग्री से ही बनाया जाता है?

यह सरासर झूठ का पुलिंदा है और भ्र्म फ़ैलाने की साजिश मात्र प्रतीत होती है। वीगन दूध कई प्रकार से और विभिन्न प्रकार की सामग्रियों से बनाया जाता है। हाँ बादाम का दूध आयातित बादाम पर निर्भर हो सकता है लेकिन अन्य वनस्पति-जन्य दूध जैसे सोया, काजू, चावल, नारियल का दूध 100% देश में पैदा हुई सामग्री से ही बनाये जाते हैं।

क्या भारत में डेयरी उद्योग पूर्णत: क्रूरता मुक्त है?

यह एक ऐसा विषय है जिस पर कोई डेयरी उद्योग कभी बात नहीं करना चाहता है। इस महत्वपूर्ण मुद्दे को या तो दबाया जाता है अथवा गलत तर्क दे कर दूध उपभोक्ताओं को हमेशा भ्रमित ही किया जाता है। चूँकि भारत की एक बड़ी आबादी क्रूरता के पहलू के कारण मांसाहार का सेवन नहीं करती है लेकिन दूध का सेवन धड़ल्ले से करती है अत: दूध की क्रूरता उजागर होने पर पशु-दूध उद्योग को भारी नुक्सान झेलना पड़ सकता है।

ट्वीट में कहा गया है कि भारत में अधिकांश दूध उत्पादन छोटे किसानों द्वारा किया जाता है जहाँ गायों की पूरी देखभाल की जाती है और उन्हें बहुत प्यार से रखा जाता है लेकिन स्तिथि इसके बिलकुल विपरीत है। चाहे कोई घर पर गाय रख कर उसका दूध निकाले या किसी व्यावसायिक डेयरी फार्म पर, दोनों का ही उद्देश्य सिर्फ मुनाफा कामना होता है न कि गायों की सेवा करना। गायों की सेवा करना या उसे माँ का दर्जा देना तो सिर्फ क्रूरता को ढकने का एक तरीका मात्र है। जहाँ मुनाफा सर्वोपरि है वहां यह प्रयास अवश्य होता है की पशुओं से अधिकाधिक दूध निचोड़ा जाए और इसी प्रयास में डेयरी-पशुओं के साथ होने वाली क्रूरता को रोके जाना असंभव है

आगे कहा है कि दूध लोकल डेयरी से खरीदने के बजाय सिर्फ पैकेटबंद जीवाणु-मुक्त ही खरीदना चाहिए क्योंकि अमूल जैसी संस्था छोटे किसानों से दूध एकत्र कर उसे पैक कर बेचती है जो सीधे किसानों को फायदा पहुंचता है और दूध भी क्रूरता मुक्त होता है। इस बात में यहाँ स्पष्ट रूप से नज़र आता है कि अमूल को सिर्फ और सिर्फ अपने मुनाफे की चिंता है और उसकी बिक्री बढ़ाने के लिए वह किसी भी हद तक झूठ बोल कर उपभोक्ताओं की गुमराह कर सकता है।

अगर आंकड़ों की बात करें तो पूरी दुनिया के डेयरी उद्योगों में हर साल लगभग 21,000,000 बछड़ों को पैदा होने के बाद मौत के घाट उतार दिया जाता है। भारत की बात करें तो यहां कोई निश्चित आंकड़े उपलब्ध नहीं है लेकिन यहाँ भी गाय के नर बछड़ों को या तो भूखा मरने के लिए सड़कों पर छोड़ दिया जाता है या चोरी छिपे मार दिया जाता है वही भैंस के नर बछड़ों को कत्लखानों में कानूनी रूप से कत्ल किया जा सकता है।

भारत में भी नस्ल सुधार के नाम पर गायों की ऐसी नस्लें तैयार की जाती है जो अपनी प्राकृतिक क्षमता से लगभग 12 गुना तक दूध पैदा कर सकती है। इस तरह की नस्लों में बहुत सी स्वास्थय समस्याएं पायी जाती है और यह आसनी से किसी बीमारी की चपेट में आ सकती है।

इस ट्वीट में वीगन दूध के लिए दूध शब्द प्रयोग करने पर भी आपत्ति जताई है कि इन्हे ‘दूध’ नहीं ‘पेय’ कहा जाए और एक प्रतिष्ठित समाचार पात्र ने यह दवा भी किया कि इस बात को लेकर अमूल कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा सकता है। इसके जवाब में वीगन लोगों द्वारा कुछ मिम्स भी जम कर शेयर किये जा रहे हैं जिसका मजा आप भी लीजिये –

क्या पशु-दूध ही प्रोटीन का जरुरी स्रोत है?

सोढी सा के इस ट्वीट से तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि यदि इंसान पशु-दूध का सेवन नहीं करेगा तो उसमें न केवल प्रोटीन और विटामिन बी 12 की कमी हो जायेगी बल्कि उसके दिमाग का विकास भी रुक सकता है !

पशुपालन और डेयरी विभाग के एक ट्वीट को रीट्वीट करते हुए, जिसमें पशु-दूध को प्रोटीन का भण्डार बताया गया है, और उसकी तुलना अन्य वीगन दूध से की गयी है, आगे लिखा है कि पशु-दूध में एकदम शुद्ध होता है, इसमें वीगन दूध की तरह कोई अन्य पदार्थ जैसे sugar, emulsifiers नहीं मिलाया जाता और न ही इसका chemical fortification किया जाता है। और यह फैक्टरी में भी नहीं बनता है।

हमारी प्रोटीन की जरूरत और पशु-दूध का सेवन

पशु-दूध में प्रोटीन अवश्य होता है लेकिन यह नहीं बताया जाता कि यह प्रोटीन प्रकृति ने किसके लिए दिया है। डेयरी उद्योग तो अपने धंधे के खातिर यह छोटी सी बात कभी बता ही नहीं सकता कि हर माँ का दूध सिर्फ उसके बच्चे के लिए ही होता है और प्रकृति उसी अनुसार उसमें पोषक तत्वों का समावेश करती है, और पशु-दूध का सेवन करने वाले दूध के नशे में चूर यह कभी सुनने को तैयार ही नहीं होते कि यह दूध उसके लिए नहीं है।

बहुत से अध्ययनों में यह सिद्ध हुआ है कि पशु-प्रोटीन इंसानों में कैंसर सहित अन्य बिमारियों का प्रमुख कारण हैं और वनस्पति प्रोटीन ही इंसानों के लिए सुपाच्य और स्वास्थ्यवर्धक होता है। किसी भी कारण से पशु-प्रोटीन का सेवन इंसानों के लिए गैर-जरुरी है।

पशु-दूध कितना शुद्ध होता है?

पशु-दूध को शुद्ध बताना सिर्फ एक मार्केटिंग के तरीके से ज्यादा कुछ भी नहीं है क्योंकि बहुत सी जांचों से यह बिलकुल स्पष्ट हो चुका है कि दूध में पस सेल्स, खून के अंश, एंटीबायोटिक, हॉर्मोन इत्यादि के अंश आवश्यक रूप से पाए जाते हैं। इसलिए इसे शुद्ध दूध कहना एकदम बेमानी है। इसके अतिरिक्त इसमें जो क्रूरता मिली हुई होती है उसका कोई हिसाब ही नहीं है।

हो सकता है वनस्पति-जन्य वीगन दूध में किन्ही कारणों से कुछ रासायनिक पदार्थ मिलाये जाते हैं लेकिन यह खून, पस, एंटीबायोटिक, हार्मोन और पशु-क्रूरता से पूर्णत: मुक्त होते हैं

डेयरी उद्योग का हमारे पर्यावरण पर क्या प्रभाव होता है?

अगले ट्वीट की बात करें तो उसमें यह सफाई देने की कोशिश की गयी है कि गायें किस तरह से हमारे पर्यावरण के संरक्षण में सहायक है।

पशु-पालन उद्योग का हमारे पर्यावरण पर असर

पशु-पालन और डेयरी विभाग का यह ट्वीट जिसे अमूल के एम डी ने रीट्वीट करते हुए डेयरी को पर्यावरण के अनुकूल बताते हुए कहा है कि गायें सिर्फ इंसानों द्वारा न खाये जाने वाले खाने को खा कर ही दूध पैदा करती है जो सिर्फ एक झूठ के पुलिंदे से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं। गायों से अधिक से अधिक दूध लेने के लिए उन्हें कई प्रकार के पौष्टिक आहर भी दिए जाते हैं जो विभिन्न प्रकार के अन्न से बनाये जाते हैं।

जबकि यह पूरी तरह से सिद्ध हो चुका है कि पशु-पालन उद्योग द्वारा ग्रीन हाउस गैसें सारे परिवहन साधनों से निकलने वाली गैसों से कही ज्यादा होती है, इस तरह का झूठ अमूल और पशुपालन विभाग द्वारा फैलाया जाना यही साबित करता है कि अमूल अपने धंधे के लिए न केवल स्वयं सफ़ेद झूठ बोल सकता है बल्कि अपने धन-बल से किसी सरकारी विभाग द्वारा भी झूठ बुलवा सकता है।

पशुपालन और डेयरी उद्योग द्वारा जितने प्राकृतिक संसाधनों का दुरूपयोग किया जाता है उससे कहीं कम संसाधनों का प्रयोग कर इतना भोजन पैदा किया जा सकता है जिससे इस धरती पर हर इंसान को पौष्टिक भोजन बहुत ही किफायती दामों पर उपलब्ध हो सकता है। जबकि डेयरी उद्योग हमारे पर्यावरण के विनाश के साथ-साथ हमारे स्वास्थय से भी खिलवाड़ कर रहा है।

इसमें यह भी कहा गया है कि गायों का मल-मूत्र धरती को उपजाऊ बनता है लेकिन इस बारे में हमें जागरूक होने की जरूरत है इससे निकलने वाली मीथेन गैस किस तरह हमारे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है, क्योकि यह तो तय है कि अमूल इसे कभी नहीं बताएगा।

प्रतिष्ठित संस्था वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ (WWF) ने डेयरी उद्योग द्वारा पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के पक्ष में कुछ आंकड़े प्रस्तुत किये जिसके अनुसार वर्ष 2017 तक विश्व के कुल पशु-दूध के उत्पादन का 20% के साथ भारत पहले स्थान पर और उसके बाद अमेरिका 12% के साथ दूसरे स्थान पर था। डेयरी उद्योग का “डेयरी से ग्राहक तक पहुँचाने की प्रक्रिया में” अमेरिका की कुल ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का लगभग 2% हिस्सा है। डेयरी उद्योग की हर गाय लगभग 60-70 लीटर अपशिष्ट पैदा करती है जल और वायु प्रदुषण का एक बड़ा कारण है।

कुछ चौंकाने आंवले तथ्य यह भी हैं कि 1 लीटर दूध पैदा करने के लिए लगभग 150 गुना पानी की आवश्यकता होती है। साथ ही एक गाय को भोजन के रूप में प्रतिदिन 40-50 किलो घास और अन्न की आवश्यकता होती है। लगभग 9% खेती की जमीन डेयरी पशुओं के लिए भोजन उगाने के लिए प्रयोग की जाती है।

क्यों अमूल को पशु-दूध के बचाव की आवश्यकता पड़ी?

यहाँ हमने अमूल के एम डी द्वारा कुछ ट्वीट के रूप में पेश किये उनके झूठ के पुलिंदे को आपके सामने रखने का प्रयास किया। इन चार ट्वीट के अतिरिक्त और भी ऐसे ट्वीट किये गए हैं जिसमें इन्ही झूठ को अलग-अलग पेकिंग में आपके सामने रखने की कोशिश की गयी है। लेकिन यहाँ सवाल यह है कि अमूल जिसका कारोबार देश विदेश में फैला हुआ है और टर्न ओवर अरबों रुपयों में है उसे अचानक वनस्पति-जन्य वीगन दूध जिसका कारोबार अभी अच्छे से शुरू भी नहीं हुआ है,के सामने अपने आप को बेहतर क्यों सिद्ध करना पड़ रहा है ?

सम्भवत: इसका एक ही कारण नज़र आता है वह है ताकतवर सोशल मीडिया पर anti dairy और वीगन मूवमेंट का बढ़ता प्रभाव और मिलने वाला जबरदस्त समर्थन। भारत के इतहास में आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि दूध जिसे न केवल एक खाद्य पदार्थ माना जाता रहा है अपितु इसका धार्मिक महत्व भी स्थापित किया गया है, का इतना मुखर विरोध किया गया हो।

आज जब डेयरी में होने वाली पशु-क्रूरता सबके सामने आने लगी है तो भारत का एक बहुत बड़ा अहिंसक शाकाहार वर्ग इस बारे में सोचने को मजबूर हुआ है कि कुछ तो गड़बड़ है इस पशु-दूध के सेवन और इसके उत्पादन में। अभी तो वीगन आंदोलन की सिर्फ एक शुरुआत भर ही है लेकिन अमूल जैसे बड़े डेयरी ब्रांड तो यह अहसाह होने लगा है कि अभी से अपना बचाव शुरू नहीं किया तो आने समय में काफी देर हो सकती है। विदेशों में देखा जाए तो वह आंदोलन काफी परिपक्व हुआ है और वहां डेयरी उद्योग तो इसकी तपन भी महसूस होने लगी है।

अगर आप ने अभी तक डेयरी उद्योग की क्रूरता को और डेयरी के हमारे स्वस्थ्य पर दुष्प्रभाव को गहराई से नहीं समझा है तो अभी भी कोई देर नहीं हुई है। आज ही इसकी तह तक जाएँ और अपने आप को इस डेयरी के जंझाल से मुक्त करें।

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